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जीविका ने बदली किस्मत: आपदा में नीतू देवी (पश्चिम चंपारण, बिहार) खड़ा किया खुद का स्वरोजगार

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Nitu devi की सफलता और संघर्ष की कहानी हिंदी में 

  • पश्चिम चंपारण, बिहार: कोरोना महामारी का दौर कई परिवारों के लिए संकट लेकर आया, लेकिन कुछ लोगों ने अपनी हिम्मत और सही मार्गदर्शन से इस आपदा को अवसर में बदल दिया। ऐसी ही एक मिसाल कायम की है गौनाहा प्रखंड के जमुनिया गाँव की नीतू देवी ने, जिन्होंने जीविका (Jivika) के सहयोग से आत्मनिर्भरता की एक नई कहानी लिखी है।

संकट से सफलता तक का सफर

  • वर्ष 2019 में जब पूरा देश कोरोना की चपेट में था, तब नीतू देवी के पति की नौकरी छूट गई। जमापूंजी समाप्त होने के बाद परिवार को दिल्ली छोड़कर वापस अपने गाँव लौटना पड़ा। आर्थिक तंगी के उस दौर में नीतू देवी ने हार नहीं मानी और 'शक्ति जीविका स्वयं सहायता समूह' से जुड़कर अपने हुनर को आजमाने का निर्णय लिया।

मात्र 10,000 रुपये से शुरू किया केक का व्यवसाय

  • नीतू देवी ने समूह से ₹10,000 का ऋण लेकर घर से ही केक बनाने का काम शुरू किया। उनके बनाए केक की गुणवत्ता और स्वाद के कारण जल्द ही आस-पास के इलाकों में उनकी मांग बढ़ गई।

व्यवसाय के विस्तार के लिए उन्हें जीविका और PMFME (Seed Capital Scheme) के तहत ₹40,000 की वित्तीय सहायता मिली। इसके बाद उन्होंने:

  • समूह से ₹50,000 का अतिरिक्त ऋण लिया।
  • जमुनिया बाजार में अपनी एक बेकरी (रोटी की दुकान) खोली।
  • आज वे केक के साथ-साथ बिस्कुट और पिज्जा भी बेच रही हैं।

सालाना कमाई और भविष्य के लक्ष्य

आज नीतू देवी की दुकान जमुनिया बाजार की पहचान बन चुकी है। उनके व्यवसाय की मुख्य उपलब्धियां इस प्रकार हैं:

  • दैनिक बिक्री: औसतन ₹5,000।
  • मासिक आय: ₹40,000 से ₹50,000 तक।
  • परिवार का सहयोग: उनके पति भी अब इस व्यवसाय में हाथ बंटाते हैं।

नीतू देवी ने न केवल अपने घर की मरम्मत कराई है, बल्कि वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा भी दिला रही हैं। उनका लक्ष्य भविष्य में एक बड़ी बेकरी यूनिट स्थापित करना है, ताकि वे अन्य महिलाओं (जीविका दीदियों) को भी रोजगार दे सकें।

निष्कर्ष: नीतू देवी की कहानी साबित करती है कि यदि हौसला बुलंद हो और जीविका जैसा सही सरकारी सहयोग मिले, तो कोई भी व्यक्ति शून्य से शिखर तक पहुँच सकता है।


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लेखक: Vinod Kumar Prasad

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