Chhath Puja Full Information in Hindi: छठ पूजा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था का महापर्व है। मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में मनाया जाने वाला यह पर्व अब पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। यह पर्व पूर्णतः प्रकृति और सूर्य देव को समर्पित है।
इस लेख में हम जानेंगे कि छठ पूजा क्यों मनाई जाती है, इसकी तैयारी कैसे होती है और छठी मैया के पारंपरिक गीतों का क्या महत्व है।
छठ पूजा का महत्व (Importance of Chhath Puja)
छठ पूजा में सूर्य देव और उनकी शक्ति 'छठी मैया' (उषा) की उपासना की जाती है। इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें डूबते हुए सूर्य और उगते हुए सूर्य, दोनों को अर्घ्य दिया जाता है। यह पर्व शुद्धता, संयम और कठिन तपस्या का प्रतीक है।
छठ महापर्व की मुख्य तैयारियां
छठ पर्व की शुरुआत नहाय-खाय से होती है, लेकिन इसकी तैयारियां हफ्तों पहले शुरू हो जाती हैं:
साफ-सफाई: लोग अपने घरों की मरम्मत और रंग-रोगन करवाते हैं। मोहल्ले के युवा मिलकर नदी, तालाब और घाटों की सफाई करते हैं।
घाट निर्माण: नदी के किनारे मिट्टी से 'सिरसोता' (छठ माता का स्थान) बनाया जाता है, जिसे फूलों और लाइटों से सजाया जाता है।
नई खरीदारी: इस महापर्व पर परिवार के सभी सदस्यों के लिए नए वस्त्र, श्रृंगार सामग्री और पूजन के बर्तनों (सूप और दउरा) की खरीदारी की जाती है।
छठ का शुद्ध खान-पान और प्रसाद
छठ पूजा का प्रसाद अपनी शुद्धता के लिए जाना जाता है।
ठेकुआ और टीकरी: यह छठ का सबसे मुख्य प्रसाद है, जो गुड़ और आटे से बनाया जाता है।
फलों का महत्व: पूजा के लिए डाभ नींबू, केला, नाशपाती, नारियल और सबसे महत्वपूर्ण 'ईख' (गन्ना) की खरीदारी की जाती है। बिना गन्ने के छठ की पूजा अधूरी मानी जाती है।
छठ पूजा के चार दिन (Step-by-Step Vidhi)
1. नहाय-खाय और खरना
व्रती लोग शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत का संकल्प लेते हैं। खरना के दिन शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है।
2. पहला अर्घ्य (शाम का अर्घ्य)
तीसरे दिन शाम को सभी लोग गाजे-बाजे के साथ घाट पर जाते हैं।
समय: दोपहर 2:00 से 3:00 बजे के बीच घाट पर पहुंचना शुरू होता है।
विधि: डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और महिलाएं समूह में बैठकर पारंपरिक छठ गीत गाती हैं।
कोसी भरना: रात को घर लौटकर गन्ने का मंडप (ताननि) बनाया जाता है और वहां मिट्टी के दीप जलाकर 'कोसी' भरी जाती है।
3. दूसरा अर्घ्य (सुबह का अर्घ्य) और समाप्ति
चौथे दिन सुबह सूर्योदय से पहले ही भक्त घाट पर पहुंच जाते हैं। जब सूर्य की पहली लालिमा दिखाई देती है, तब कच्चा दूध और जल अर्पित कर अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रती महिलाएं पारण (व्रत खोलना) करती हैं।
पारंपरिक छठ गीत (Chhath Geet Lyrics in Hindi)
छठ पूजा की मिठास इसके गीतों में बसी है। यहाँ कुछ प्रचलित पंक्तियाँ हैं:
कोसी भरने का गीत:
"कोपी कोपी बोलेली छठी माई, सुनिए ये सेवक लोग...
रउरा घाटे दुभिया कटवाई देब, मकरी बहारी देब, सुनी ये छठी माई..."
सेवा भाव का गीत:
"छठी बैठली भवन में जाटा दिले छितयारे...
अरे उन्हीं के सेवक केवन सेवखा, जाटा दिहले बटोर..."
Chhat pooja ki suruwat kaise hui ?
छठ पूजा (Chhath Puja) न केवल एक धार्मिक त्योहार है, बल्कि यह प्रकृति और आस्था का सबसे सुंदर संगम है। इसे 'महापर्व' कहा जाता है क्योंकि इसमें साफ-सफाई, शुद्धता और कठिन तपस्या का विशेष महत्व है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत कब हुई? चलिए जानते हैं इसके पीछे छिपी पौराणिक कथाओं के बारे में।
1. भगवान राम और माता सीता की कथा (त्रेता युग)
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान श्रीराम रावण का वध करके अयोध्या लौटे, तब उन्होंने राज्याभिषेक के बाद 'राजसूय यज्ञ' करने का संकल्प लिया। मुदगल ऋषि की आज्ञा पर माता सीता और प्रभु राम ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य देव की उपासना की थी। माता सीता ने सरयू नदी के तट पर कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया था, जिससे उन्हें संतान सुख और राज्य की समृद्धि का वरदान मिला।
2. दानवीर कर्ण और सूर्य उपासना (द्वापर युग)
महाभारत काल में सूर्य पुत्र कर्ण का नाम सबसे पहले आता है जिन्होंने सूर्य की उपासना को जन-जन तक पहुँचाया। कर्ण प्रतिदिन घंटों नदी के पानी में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। कहा जाता है कि कर्ण के इसी कठिन तप के कारण उन्हें कवच और कुंडल प्राप्त हुए थे। आज भी बिहार के मुंगेर और भागलपुर क्षेत्रों में कर्ण द्वारा की गई पूजा की याद में छठ धूमधाम से मनाया जाता है।
3. राजा प्रियव्रत और छठी मैया
एक प्राचीन कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र रत्न प्राप्त हुआ, लेकिन वह मृत पैदा हुआ। जब राजा दुखी होकर प्राण त्यागने लगे, तब ब्रह्मदेव की मानस पुत्री 'षष्ठी देवी' (छठी मैया) प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि जो भी मेरी पूजा सच्चे मन से करेगा, उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी। राजा ने विधि-विधान से पूजा की और उन्हें यशस्वी पुत्र मिला।
छठ पर्व का वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व
प्रकृति की पूजा: यह इकलौता ऐसा पर्व है जहाँ डूबते हुए सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है। यह हमें सिखाता है कि जो अस्त हुआ है, उसका उदय भी निश्चित है।
शुद्धता: इस पर्व में मिट्टी के चूल्हे और प्राकृतिक फलों (ठेकुआ, गन्ना, डाभ नींबू) का उपयोग होता है, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए उत्तम है।
Conclusion (निष्कर्ष):
छठ पूजा की शुरुआत चाहे किसी भी काल में हुई हो, इसका मूल संदेश हमेशा एक ही रहा है— शुद्धता, समर्पण और प्रकृति के प्रति आभार। आज यह महापर्व न केवल भारत बल्कि विदेशों में भी प्रवासी भारतीयों द्वारा बड़े गर्व से मनाया जाता है।

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